सभी किसानों के लिए एमएसपी का क़ानूनी हक़ – किसान स्वराज का नोट

8:48 pm in News by Kavitha

सभी किसानों के लिए एमएसपी[1] का क़ानूनी हक़

सभी किसानों के लिए एमएसपी  का क़ानूनी हक़ – किसान स्वराज का नोट – pdf

 

वर्तमान में भारत में जारी किसान आंदोलन की एक अहम माँग क़ानूनी गारंटी वाली लाभकारी क़ीमत मिलने से जुड़ी है। आंदोलनरत किसानों की मांग है कि एमएसपी उन्हें क़ानूनी गारंटी के आधार पर वाक़ई मिले और सरकार की यह ज़िम्मेदारी हो कि वह ऐसा सुनिश्चित करे। इस पर संशय रखने वालों के कई सवाल भी हैं: इसका कार्यान्वयन कैसे किया जा सकता है? क्या इससे सरकारी ख़ज़ाने पर बहुत बोझ नहीं पड़ेगा? क्या यह बाज़ारों में भारी दख़ल-अंदाज़ी नहीं होगी? इससे उपभोक्ताओं के स्तर पर क़ीमतें बढ़ने और उन पर होने वाले प्रभाव और अर्थव्यवस्था में सामान्य मुद्रास्फीति में होने वाली बढ़ोतरी से कैसे निपटेंगे? क्या इससे हमारी निर्यात की प्रतिस्पर्धी क्षमता प्रभावित नहीं होगी? इत्यादि।

 

एमएसपी के क़ानूनी हक़ के पक्षधर लोगों की ओर से ASHA (Alliance for Sustainable and Holistic Agriculture) (किसान स्वराज) द्वारा यह नोट तैयार किया गया है यह बताने के लिए कि कैसे एमएसपी एक क़ानूनी हक़ के तौर पर न सिर्फ़ संभव है बल्कि वांछनीय है और कैसे अच्छी प्लानिंग के ज़रिए इसके परिणामों/प्रभावों का अच्छे से प्रबंधन किया जा सकता है।

 

ASHA में किसान की हमारी परिभाषा वही है जो 2007 की ‘किसानों के लिए राष्ट्रीय नीति’ (NPF) में अपनाई गई थी क्योंकि यह परिभाषा भूमि के स्वामित्व से नहीं जुड़ी है और बिना ज़मीन के स्वामित्व के भी कई तरह के कृषि उत्पादन को अपने दायरे में लेती है। हम यह मानते हैं कि अगर कभी किसी किसान की ‘पहचान’ (कि वह व्यक्ति ‘किसान’ है या नहीं) को लेकर कोई विवाद या सवाल हो तो ऐसी स्थिति में पंचायत द्वारा जारी प्रमाण-पत्र ही काफ़ी होना चाहिए, इसके अलावा क़ानून में और कुछ अतिरिक्त प्रावधान जोड़ने की ज़रूरत नहीं है।

 

दूसरा, ASHA यह जानता है कि किसी एक ही वस्तु/उत्पाद की उत्पादन लागत देश के अलग-अलग इलाक़ों में अलग-अलग होती है (यही वजह है कि वित्तीय संसाधनों का स्तर भी अलग-अलग तय किया गया है)। राष्ट्रीय स्तर पर एक समान एमएसपी (जिससे अधिकतम संख्या में किसानों को फायदा हो) के लिए बल्कलाइन कॉस्टिंग अपनानी होगी केवल अलग-अलग राज्यों में उत्पादन की लागत का भारित औसत (weighted average) निकालने से काम नहीं चलेगा।

 

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि वर्तमान (सरकारी) ख़रीद व्यवस्था की तुलना एमएसपी व्यवस्था से नहीं की जानी चाहिए – अक्सर जब भी क़ानूनी एमएसपी की व्यवस्था पर चर्चा होती है तो वर्तमान ख़रीद व्यवस्था की आलोचना को आगे कर दिया जाता है।

 

यह नोट यह भी तर्क देता है कि क़ीमत की गारंटी की व्यवस्था, प्रत्यक्ष आय समर्थन (Direct Income Support) की तुलना में एक बेहतर नीति उपकरण है और यह दोनों तंत्र (जो एक दूसरे के विकल्प नहीं हैं) साथ-साथ चलकर किसानों की ज़िंदगी बेहतर बना सकते हैं। किसान परिवारों को न्यूनतम आय की गारंटी के लिए दरअसल क़ीमत के पहलू पर मज़बूती से काम करना ज़रूरी है।

 

 

 

पृष्ठ-भूमि

               किसान अपने उत्पादन की पूरी लागत भी बाज़ार से वसूल नहीं कर पाते। जिस अनुमानित ‘उत्पादन की लागत’ की गणना आधिकारिक तौर पर की जाती है उसमें किसान परिवारों द्वारा लगाए संसाधन परिलक्षित नहीं होते। साथ ही, किसान इस आधिकारिक अनुमानित लागत पर भी ठीक-ठाक नफ़ा नहीं कमा पाते। आधिकारिक विश्लेषण जैसे श्री रमेश चंद कमेटी की रिपोर्ट (2015) ने भी यह रेखांकित किया कि कैसे उत्पादन लागत के अनुमान ग़लत रहे हैं। अगर किसान अपने उत्पादन की लागत ही वसूल नहीं कर पा रहे हैं तो फिर परिवार कैसे चलाएंगे? वे अपने खेतिहर कामगारों को न्यूनतम मज़दूरी कैसे दे पाएंगे? कैसे वे उन आर्थिक वृद्धि की योजनाओं में अपना योगदान दे पाएंगे जो हमारे नीति निर्माता बना रहे हैं? विडंबना यह है कि आज भारतीय सरकार जिन 23 फ़सलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य का ऐलान करती है वाक़ई में कोई ऐसा सार्थक तंत्र नहीं है जो इस एमएसपी को हक़ीक़त में बदल सके, विशेषकर उन अधिकतर किसानों के लिए जिनकी फ़सलें नहीं ख़रीदी जातीं। यह भी साफ़ नहीं है कि ऐसे किसी तंत्र के अभाव में क्यों 23 फ़सलों के लिए एमएसपी का ऐलान किया जाता है।

 

एमएसपी की गारंटी क्यों?

               खेती में बहुत जोखिम होता है। साथ ही, भारत के किसान अधिकतर सीमांत और लघु किसान हैं और खेती भी यहाँ  अधिकतर वर्षा-सिंचित होती है जिसके कई नुक़सान भी हैं। ज़ाहिर है, खेती में कई जोखिमों के चलते आपूर्ति में भारी घटत-बढ़त होती रहती है जबकि माँग लगातार स्थिर बनी रहती है यानी उसमें बहुत ज़्यादा उतार-चढ़ाव नहीं आते। माँग स्थिर बने रहने और आपूर्ति में बहुत घटत-बढ़त होते रहने से क़ीमतें बहुत ऊपर-नीचे होती रहती हैं।

 

साथ ही, आय में अंतर आने पर भी खाद्य सम्बंधी माँग में बहुत ज़्यादा उतार-चढ़ाव नहीं आते और खाद्य-उत्पादों की माँग अर्थव्यवस्था की सामान्य वृद्धि दर से पीछे ही रहती है। इन उपरोक्त कारणों से उत्पादकों को लाभकारी क़ीमतें दिलाने के लिए प्रयास जायज़ और ज़रूरी हैं।

 

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि जो आर्थिक मॉडल हमने अपनाया है, और भारत में विकास आयोजन की जो औपचारिक प्रक्रिया है उसमें कोशिश यह रही है कि खाद्य क़ीमतों को कम रखा जाए भले ही उत्पादन की लागत ज़्यादा हो। ऐसा अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों और अन्य क्षेत्रों के कामगारों को फ़ायदा पहुँचाने के लिए किया गया। लेकिन इस नीतिगत दृष्टिकोण की मार किसानों पर पड़ी और उनके ज़रिए अर्थव्यवस्था के दूसरे हिस्सों को क्रॉस सब्सिडाईज़ किया गया। अब समय आ गया है कि इस मॉडल को बदला जाए।

 

ऐसा करने का एक तरीक़ा तो पीएम-किसान जैसे प्रत्यक्ष आय समर्थन उपलब्ध कराने का है लेकिन ASHA में हम मानते हैं कि आय संबंधी या खेती संबंधी सहयोग, जैसा कि तेलंगाना में प्रति एकड़ के आधार पर दिया जा रहा है यह क़ीमत की गारंटी के अतिरिक्त है। एमएसपी की गारंटी एक बहुत प्रभावशाली और लचीला नीतिगत उपकरण है जिससे कई अहम और वांछनीय बदलाव भारतीय कृषि में आ सकते हैं, जैसे: भूमि उपयोग या खेती संबंधी बदलाव, आयात प्रतिस्थापन और कृषि-पारिस्थितिकी की प्रक्रियाओं को बढ़ावा देना, आदि। ऐसी नीति से आय की बढ़ोतरी में भी भारी सुधार होगा।

 

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि एक बाज़ार-केंद्रित मॉडल जिसने बड़ी पूंजी को अ-नियंत्रित बाज़ारों में काम करने और साथ ही एक तकनीक-केंद्रित मॉडल जिसने पैदावार को ज़्यादा से ज़्यादा बढ़ाने पर ही सारा ज़ोर दिया है और बाक़ी अनिवार्यताओं को नज़र-अन्दाज़ किया है वह पूरे विश्व में और भारत में विफल हुआ है। यह साफ़ है कि एक दूसरे मॉडल की ज़रूरत है जो भारतीय कृषि संकट के अनुकूल बनाया जाए ना कि सिर्फ़ दूसरी जगहों में विफल हुई नीतियों का अंधानुकरण हो।

 

चूँकि हमारी अर्थव्यवस्था दूसरे क्षेत्रों में रोज़गार उपलब्ध कराने में सक्षम नहीं है तो यह ज़रूरी है कि किसानों को एक क़ीमत की गारंटी की व्यवस्था द्वारा सहयोग और संरक्षण दिया जाए।

 

एमएसपी की क़ानूनी गारंटी के हक़ के निम्न आधार भी हैं: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21, अनुच्छेद 38(2), अनुच्छेद 39 (क), और अनुच्छेद 43। तथा, किसानों और ग्रामीण क्षेत्रों में काम कर रहे लोगों के हक़ों पर संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषणापत्र के प्रति भारत की प्रतिबद्धता।

 

इसी पृष्ठभूमि में हम भारतीय सरकार द्वारा एक एमएसपी की गारंटी का क़ानून बनाने की मांग करते हैं जिससे कि सभी किसानों को बाज़ार में उनके कृषि उत्पादों के लिए न्यूनतम और लाभकारी क़ीमतें मिल पाएँ और इस प्रस्ताव का हम निम्न कारणों से भी समर्थन करते हैं:

 

  • क़ीमत सबसे अहम, समीपस्थ और सीधा तरीक़ा है खेती की आय बढ़ाने का। भारत सरकार का एक घोषित उद्देश्य किसानों की आय को दोगुना करने का है। किसानों की आय को बेहतर करना ज़रूरी है क्योंकि बड़ी संख्या में किसान या तो नुक़सान उठाकर खेती करते हैं और या फिर उनकी आय बहुत कम और अनियमित होती है जिससे सामाजिक विषमताओं में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। किसानों की आय को दोगुना करने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ज़रूरी है कि क़ीमतों की गारंटी दी जाए।
  • यह अपेक्षा है कि एमएसपी की क़ानूनी गारंटी की व्यवस्था से उन किसानों को फ़ायदा होगा जो वर्तमान (सरकारी) ख़रीद व्यवस्था से फ़ायदा नहीं ले पा रहे। साथ ही, वर्तमान में अधिकतर किसान विनियमित बाज़ारों के दायरे से बाहर हैं। अधिकतर अपने उत्पाद को कई बाध्यताओं की वजह से गांव के स्तर पर स्थानीय व्यापारियों को बेचते हैं जिसमें बहुत कम मात्रा में अधिशेष (surplus) का होना भी शामिल है। ऐसे कई किसानों को एमएसपी की क़ानूनी गारंटी से फ़ायदा होगा। वे सीमांत किसान उत्पादक भी इससे लाभान्वित होंगे जो शुद्ध खाद्य उपभोक्ता (net food consumers) हैं क्योंकि जन वितरण प्रणाली (PDS) और अन्य खाद्य योजनाओं का विस्तार करने से ख़रीद भी ज़्यादा होगी।
  • क़ीमत की ऐसी गारंटी से फ़सल विविधीकरण (crop diversification) भी होगा। क्योंकि ऐसी व्यवस्था में किसान वे फ़सलें उगाएँगे जो उनकी पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुकूल हों ना कि वे फ़सलें जिनकी बाज़ार में मिलने वाली क़ीमत का अनुमान लगाना आसान हो। वर्तमान ख़रीद व्यवस्था जो धान (चावल) और गेहूं पर अत्यधिक केंद्रित है (और साथ ही गन्ने के लिए उचित लाभकारी दाम मिलने की व्यवस्था-FRP) ने फ़सल विविधता को बर्बाद कर दिया है। फ़सलों की विविधता होने से हमारे पास गेहूं और धान (चावल) के अत्यधिक भंडार भी नहीं जमा होंगे और दाल, तिलहन आदि के मामलों में आयात प्रतिस्थापन की सम्भावना से विदेशी मुद्रा भंडार में भी बचत हो सकती है।
  • क़ीमत की गारंटी होने से उम्मीद है कि अपने आप ही एक ऐसी व्यवस्था चलन में आएगी जिससे कम लागत और कम बाहरी इनपुट वाली खेती को बढ़ावा देने का दबाव सरकार पर होगा क्योंकि अधिक लागत वाली खेती होने से सरकार को ज़्यादा एमएसपी देनी पड़ेगी और इससे सार्वजनिक वित्त पर पड़ने वाले बोझ से वे बचना चाहेंगे।
  • भारत में अधिकतर उपभोक्ता खाद्य उत्पादन की प्रक्रिया में भी किसी न किसी तरह भाग लेते हैं। यह उम्मीद है कि किसानों के फ़ायदे वाली व्यवस्था अपने आप ही उपभोक्ताओं के फ़ायदे की भी होगी। क्योंकि किसानों को फ़ायदा होने पर  उपभोक्ताओं के तौर पर उनकी क्रय शक्ति बढ़ जाएगी।
  • एमएसपी की गारंटी देने से जब कुछ विशेष फ़सलों और खेती की प्रक्रियाओं को प्रोत्साहित किया जाएगा तो उससे खेती के  टिकाऊपन (sustainability) में इज़ाफ़ा होगा। कम बाहरी इनपुट और अधिक एमएसपी यहाँ प्रेरक सिद्धांत हो सकता है। इसी तरह, वर्षा-सिंचित खाद्य फ़सलों (जैसे बाजरा/जुआर, तिलहन आदि) की एमएसपी ज़्यादा रखी जा सकती है।

 

इस प्रस्ताव में ऐसा नहीं है कि बाज़ारों को पूरी तरह ख़त्म किया जा रहा है। क़ीमत के निर्धारण में बाज़ार की शक्तियाँ भी काम करती रहेंगी (मांग और आपूर्ति, गुणवत्ता, मूल्य संवर्धन, ब्रांडिंग, उच्च गुणवत्ता की लेब्लिंग की संभावनाएँ आदि होंगे) लेकिन उस एमएसपी के ऊपर/अतिरिक्त यह सब होगा जो सभी के लिए अनिवार्य होगी। यह प्रस्तावित व्यवस्था तभी काम करेगी जब किसानों और उपभोक्ताओं के शिक्षण और विस्तार में ज़्यादा निवेश किया जाए और खेती को एक व्यवहार्य और टिकाऊपन दिशा में ले जाने की पहल की जाए।

 

सभी किसानों को एमएसपी की क़ानूनी गारंटी के क्रियान्वयन के कौन-कौन से तरीक़े हैं?

 

2017-18 में ऑल इंडिया किसान संघर्ष कोऑर्डिनेशन कमेटी के प्रयासों से एक गारंटी वाली और लाभकारी एमएसपी व्यवस्था सम्बंधी एक विधेयक तैयार किया गया और देश भर में चर्चाओं और विचार-विमर्श के बाद इसे परिष्कृत किया गया। तथा, 21 राजनीतिक दलों के अहम नेताओं से सलाह-मशविरे के बाद इसे अंतिम रूप दिया गया। इस विधेयक को 2018 में संसद के दोनों सदनों में एक निजी सदस्य विधेयक के तौर पर पेश किया गया। इसे तैयार करने वालों में अहम भूमिका ASHA-किसान स्वराज ने निभाई थी। इस नोट में उक्त विधेयक के अलावा भी कुछ अतिरिक्त (बेहतर) तत्व शामिल हैं।

 

हमारा मानना है कि सभी किसानों के लिए एमएसपी के क़ानूनी हक़ को वास्तविक स्वरूप देने के लिए कुछ उपाय ज़रूरी हैं। यह उपाय तात्कालिक और दीर्घकालिक दोनों स्थितियों को मद्देनज़र रख सुझाए गए हैं। और इस बात को भी ध्यान में रखा गया है कि अलग-अलग उत्पाद उगाने वाले देश के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले किसानों की स्थितियाँ काफ़ी अलग-अलग हैं। जल्दी ख़राब होने वाली और लम्बे समय तक ख़राब ना होने वाली वस्तुओं के लिए यह रण नीति अलग-अलग हो सकती है। हालाँकि यहाँ ज़्यादा ज़ोर लम्बे समय तक ख़राब ना होने वाली वस्तुओं से है लेकिन अन्य वस्तुओं के लिए भी उचित बदलाव कर इस रण नीति को काम में लिया जा सकता है। इस तरह, यह एक ‘पैकेज’ होना चाहिए जिसमें अलग-अलग वस्तुओं, किसानों की श्रेणियों, इलाक़ों आदि के आधार पर अलग-अलग नीति उपकरणों और तौर-तरीक़ों पर उचित ज़ोर होना चाहिए। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि इन कई तौर-तरीक़ों को पहले से ही काम में लिया जा रहा है (किसी न किसी योजना के तहत) लेकिन उन्हें एक समान क़ानूनी ढाँचे में नहीं लाया गया है। क्रियान्वयन के कुछ तौर-तरीक़े और मुख्य सिद्धांत नीचे सुझाए गए हैं।

 

1) किसानों से एमएसपी से नीचे कोई ख़रीद ना हो: इसे अनिवार्य किया जाए (और इसके उल्लंघन को क़ानूनी अपराध बनाया जाए) कि कृषि उत्पादों की सभी ख़रीद किसानों से एमएसपी या उससे ज़्यादा दाम पर ही हो, ख़रीदार चाहे कोई भी हो (सरकारी ख़रीद एजेंसी, निजी व्यापारी या कंपनियां, किसान समूह या फिर सीधे उपभोक्ता)। यह ऐसा ही है जैसे सरकार एक न्यूनतम मज़दूरी का क़ानून बनाकर एक न्यूनतम स्तर तय करती है कि असंगठित क्षेत्र में किसी भी व्यक्ति या संस्थान द्वारा उनके कामगारों को (कम-से-कम) कितनी मज़दूरी दी जानी चाहिए। इस अपराध के लिए तय जुर्माना ऐसा होना चाहिए कि उससे उल्लंघन पर लग़ाम भी लगे और व्यापारी बाज़ार में भाग लेना भी जारी रख पाए। हालांकि जुर्माना किसानों के लिए बाज़ार की स्थितियाँ बेहतर बनाने के लिए है लेकिन एक व्यक्तिगत किसान तभी फ़ायदे में होगा जब सरकार ख़रीद के लिए सुलभ और पर्याप्त काउंटर खोले जहां कोई किसान जिसे एमएसपी नहीं मिल रही है वह किसी भी दिन इस काउंटर पर सरकार को एमएसपी पर अपना उत्पाद बेच सके। ऐसा विशेषकर लम्बे समय तक ख़राब ना होने वाली (non-perishable) वस्तुओं के मामले में होना ज़रूरी है। इस तरह की फ़ॉल-बैक ख़रीद का भरोसा क़ानूनी प्रावधानों का हिस्सा होना चाहिए और एमएसपी से नीचे ख़रीद पर भी रोक लगनी चाहिए।

 

2) खाद्य योजनाओं के लिए ख़रीद की विस्तृत, विकेन्द्रीकृत और बेहतर व्यवस्था: खाद्य योजनाओं (जैसे: PDS, ICDS और मिड-डे मील स्कीम आदि) के लिए सरकारी ख़रीद को विस्तृत करने से खाद्य विविधता बढ़ेगी और बाजरा/जुआर, दालें, तिलहन आदि की ख़रीद होने से यह खाद्य योजनाएं वाक़ई में पोषण की सुरक्षा भी सुनिश्चित कर पाएँगी। ऐसा धान (चावल) और गेहूं की अत्यधिक ख़रीद को कम करके किया जा सकता है, जिससे अनुमानित लगभग 20,000 करोड़ रुपयों की बचत होगी और अन्य अनाजों की ख़रीद को लक्ष्य तय करके बढ़ाया जा सकता है। उपभोक्ताओं के स्तर पर ‘विस्तार’ का मतलब है जन वितरण प्रणाली के कवरेज को सार्वभौमिक किया जाना, इससे यह सुनिश्चित होगा कि किसानों से ख़रीद करने के बाद स्टॉक का निबटारा/वितरण कोई बड़ा मुद्दा नहीं रहेगा। ज़ाहिर है कि इसके लिए कई सुधार करने होंगे और विकेन्द्रीकृत और ‘स्थानीय’ ख़रीद का तरीक़ा अपनाना होगा (अलग-अलग इलाक़ों में अलग-अलग उत्पादों के लिए एक श्रेष्ठतम (optimal) स्तर तय किया जा सकता है) और साथ में महिलाओं के स्वयं सहायता समूह, FPO, PACS आदि को भंडारण, प्रॉसेसिंग और वितरण प्रक्रिया में शामिल किया जा सकता है। ऐसे मामलों में जहाँ स्पेशल व्हिकल जैसे महिला SHGs को ख़रीद केंद्र संचालन की ज़िम्मेदारी सौंपी जाती है वहाँ क़ीमत का भुगतान भी उनके हाथों में दिया जा सकता है ताकि वे लैंगिक-न्यायपूर्ण तरीक़े से यह काम कर सकें।

 

3) बाज़ारों में हस्तक्षेप के बेहतर तरीक़े: बाज़ारों में हस्तक्षेप चुस्त, समयानुकूल और सीमित हो ताकि घटती क़ीमतों को सरकारी एजेंसियों द्वारा सम्भाला जा सके। स्टॉक की बिक्री तुरंत होना ज़रूरी है ताकि बड़े स्टॉक रखने की अतिरिक्त लागत कम-से-कम की जा सके, साथ ही, कटाई होने के 2 महीने के अंदर-अंदर और दूर-दूर स्थित खुले बाज़ारों में यह होना चाहिए। इसके लिए यह भी ज़रूरी है कि सरकार हस्तक्षेप करने वाली एजेंसियों के घाटे का भार भी उठाए।

 

4) कम लागत वाली कृषि-पारिस्थितिकी (agro-ecological) खेती को बड़े स्तर पर स्थापित करना: कम लागत वाली कृषि-पारिस्थितिकी का विस्तार करना ताकि सरकार के इनपुट सब्सिडी में निवेश को कम किया जा सके और किसानों के लिए उत्पादन की लागत को कम किया जा सके। यह क्रियान्वयन की एक मुख्य रणनीति होनी चाहिए। इससे मध्यम और दीर्घकाल में यह सुनिश्चित होगा कि एमएसपी की गारंटी से पूरी अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति ना बढ़े और सरकार को कोई भारी वित्तीय बोझ भी ना उठाना पड़े। साथ ही, आर्थिक और पर्यावरणीय टिकाऊपन जैसे मुद्दों का भी साथ-साथ समाधान होगा। इस तरीक़े के तहत कुछ विशिष्ट फ़सलों और पारिस्थितिकी उत्पाद प्रक्रियाओं को और प्रोत्साहित किया जा सकता है।

 

5) Negotiable Warehouse Receipts Scheme (NWRS): एमएसपी की गारंटी के क्रियान्वयन के लिए एक अहम तरीक़ा NWRS योजना को बेहतर बनाकर इसका विस्तार करना है ताकि कृषि उत्पादों की बिक्री पूरे साल हो सके सिर्फ़ कटाई के मौसम में ही बहुत बड़ी मात्रा में आवक ना हो (जिससे कि क़ीमतें कम मिलती हैं)। इस योजना में ‘ज़ब्ती का हक़’ भी किसानों के लिए होना चाहिए ताकि जब बाज़ार की क़ीमतें एमएसपी से कम हों और छः महीनों तक भी एमएसपी से कम ही रहें तो भंडारित माल सरकार की ज़िम्मेदारी बन जाए और इस माल को सरकार अपने क़ब्ज़े में लेकर किसानों को एमएसपी उपलब्ध कराए।

 

6) किसान उत्पादक संगठनों (FPO) को बाज़ार के मज़बूत खिलाड़ी बनाना: एमएसपी गारंटी के लिए किसान उत्पादक संगठनों में निवेश कर उन्हें मज़बूत बनाना एक अहम रणनीति है। इन FPOs को सिर्फ़ बड़ी कम्पनियों के लिए माल इकट्ठा करने वाले आढ़तियों के तौर पर ना देखते हुए उन्हें ऐसे बराबर के बाज़ार के खिलाड़ी मानकर निवेश करना चाहिए जिनके पास अपने सदस्यों के लिए मुनाफ़ा कमाने का उद्यमी/व्यावसायिक कौशल है। ऐसे निवेशों में भंडारण, प्रोसेसिंग और मूल्य संवर्धन की सुविधाएँ होनी चाहिए जिससे सामूहिक अवधारण हो और बाज़ार में उनकी सौदा-शक्ति भी बढ़े। साथ ही, उनके लिए संस्था-निर्माण में भी बड़े निवेश किए जाने चाहिए ताकि सबसे हाशिए के किसानों को इनमें शामिल कर उन्हें सशक्त किया जा सके (भूमि के स्वामित्व की शर्त के बिना)।

 

7) कृषि उत्पादों के लिए आयात की नीतियाँ: यह सुनिश्चित करना कि किसी कृषि आयात की भारत में प्रवेश के समय क़ीमत उस उत्पाद के लिए भारत में घोषित एमएसपी से कम ना हो, यह एक अहम रणनीति हो सकती है। साथ ही, यह सुनिश्चित करना कि आयात-निर्यात संबंधी निर्णय ऐसे ना हों जिनसे अधिक सब्सिडी वाले उत्पादों की डंपिंग या स्थानीय बाज़ारों को तोड़-मरोड़ कर रख देने वाली मात्राएँ इकट्ठी ना हों। यह भी एक अहम क्रियान्वयन की रणनीति हो सकती है। इसके लिए ज़रूरी होगा कि बहुत विवेक-पूर्ण आयात-निर्यात संबंधी निर्णय लिए जाएं। बाउंड टैरिफ़ दरों का पूरा इस्तेमाल किसानों के हितों को प्राथमिकता देते हुए किया जाए ना कि सिर्फ़ औद्योगिक हितों को ध्यान में रख कर। जहां भी संभव या ज़रूरी हो मात्रा सम्बंधी प्रतिबंध लगाए जाएं। कुछ विशेष उपाय किए जाएं: ‘विशेष उत्पाद’ के प्रावधान का सावधानी से इस्तेमाल हो, खाद्यान्न के सार्वजनिक भंडारण के लिए नेगोशीएटेड जगहें हों, कृषि को मुक्त व्यापार समझौतों आदि से बाहर रखा जाए, आदि। इस पूरे पैकेज को कुछ उत्पादों के लिए आयात प्रतिस्थापन की नीतियों के तौर पर विकसित किया जाना चाहिए जहां कुछ विशेष उत्पादों के लिए आयात पर भारी निर्भरता का धीरे-धीरे समाधान किया जा सके।

 

8) स्पेशल व्हिकल जैसे राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड के लिए पर्याप्त बजट/निवेश: 1980 में भारत में तिलहन क्रांति के समय NDDB एक प्राइस बैंड की नीति के ज़रिए बाज़ार में हस्तक्षेप के काम में शामिल हुआ जिसमें ख़रीद की क़ीमतों को कृषि लागत और मूल्य आयोग द्वारा अनुशंसित दर से कम-से-कम 40% ज़्यादा पर तय किया गया। यह बोर्ड ख़रीद, प्रॉसेसिंग में निवेश, वितरण और अपने ब्रांडेड खाद्य तेल की बिक्री आदि कामों में एक शुरुआती मार्केट इंटरवेंशन फंड के ज़रिए शामिल हुआ। और कुछ वित्तीय संस्थानों से इसे विशेष क्रेडिट लाइन भी मिली। कुछ विशेष सहकारी व्हिकलस के लिए एक ऐसा ही या बेहतर निवेश का पैकेज बनाया जा सकता है जिससे कि उनके सदस्यों को एमएसपी की गारंटी मिल पाए।

 

Price Deficiency Payment System: कुछ उत्पादों के लिए एमएसपी की गारंटी के क्रियान्वयन का यह एक अहम तरीक़ा हो सकता है विशेषतः जो उत्पाद जल्दी ख़राब होने वाले (perishable) हों या जिनमें उपभोक्ताओं पर प्रभाव को रोकना हो। लेकिन ऐसा मध्य प्रदेश की भावांतर भुगतान योजना की तर्ज़ पर नहीं होना चाहिए जहां किसानों को तो भारी घाटा हुआ और रिपोर्ट्स बताती हैं कि व्यापारियों ने आपस में गठजोड़ कर इसका फ़ायदा उठाया। एमएसपी गारंटी की व्यवस्था में पीडीपीएस एक तरीक़े से कुछ अधिसूचित उत्पादों के लिए फ़सल बीमा की तरह काम करना चाहिए। एक अधिसूचित इलाक़े में उन सभी लोगों को इसका लाभ मिले जो उस उत्पाद-विशेष को उगा रहे हों। और इसके लिए कटाई के मौसम में दो-तीन महीनों की औसत मंडी की क़ीमत के डाटा को इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इसे एक व्यक्तिगत किसान आधारित मैकेनिज्म नहीं बनाया जाना चाहिए बल्कि एक उत्पाद के एक स्थान-विशेष में सभी उत्पादकों पर यह लागू होना चाहिए भले ही विपणन माध्यम कोई भी हो। यह मंडियों से प्राप्त क़ीमत संबंधी इंटेलिजेंस के आधार पर काम करेगा। इसके लिए मंडियों की संख्या बढ़ाना लाभकारी होगा और सुदृढ़ प्राइस इंटेलिजेंस मेकैनिज्म विकसित करना भी फ़ायदेमंद होगा। इसके लिए खेती और व्यापार के अभिलेखों को बेहतर करने के लिए अलग से काम भी करना पड़ेगा। जहां किसी उत्पाद के लिए यह पीडीपी सिस्टम अधिसूचित हो वहां व्यापारियों पर जुर्माना/अपराध के प्रावधान लागू नहीं होंगे, किसानों का हक़ उन्हें दिलाने का काम सरकार का है यही इस क़ानून का मुख्य प्रावधान है। वैकल्पिक तौर पर, यह भी हो सकता है कि पीडीपीएस व्यवस्था में किसान से ख़रीदते समय व्यापारी उसे एमएसपी की दर से भुगतान करे लेकिन फिर सरकार से मुआवज़ा ले सके यदि व्यापारी यह साबित कर सके कि वह क़ीमत देने से उसे नुक़सान हुआ है। ऐसा व्यापारियों के संभावित गठजोड़ को रोकने के लिए ज़रूरी है।

 

किसानों के हक़ सुनिश्चित करने के लिए मुआवज़े की व्यवस्था: उपरोक्त तरीक़ों के अलावा एमएसपी की क़ानूनी गारंटी के क़ानून को लागू करने के लिए एक सांस्थानिक ढाँचा होना ज़रूरी है और साथ ही इसमें तालुका स्तर पर एक मुआवज़े की व्यवस्था होना भी ज़रूरी है जिसकी प्रक्रियाएं समय-बद्ध और किसानों के हित में हों ताकि जो किसान बाज़ार से एमएसपी पाने में नाकाम हों उन्हें मुआवज़ा मिल सके। इन सभी प्रावधानों के बाद भी उन ख़रीदारों के लिए दंडात्मक प्रावधान भी होने चाहिए जो क़ानून का उल्लंघन करें।

 

कुछ दिखती हुई समस्याएँ और उनसे निपटने के उपाय:

एमएसपी की गारंटी भारतीय कृषि की सभी समस्याओं का कोई अचूक इलाज नहीं है और ASHA-किसान स्वराज ऐसा कोई दावा भी नहीं करता। मसलन, जलवायु परिवर्तन और एक्सट्रीम वेदर इवेंट्स की वजह से अगर किसान बाज़ार में बेचने लायक अधिशेष खेती ही ना कर पाए तो एमएसपी की गारंटी का क़ानून इसमें मदद नहीं कर पाएगा। लेकिन फिर भी यह एक बहुत अहम उपाय है जिसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती।

 

  • किसानों का इंटरलॉक्ड बाज़ारों में फँसे होना: इस प्रस्ताव में जैसा कि ऊपर बताया गया है, किसानों को तभी फ़ायदा होगा अगर वे इंटरलॉक्ड बाज़ारों से मुक्त हो सकें, अपने-आप को संगठित कर सकें और सुनिश्चित कर सकें कि व्यापारी क़ानून का पालन करें और सरकार कुछ हस्तक्षेप के तरीक़ों से बाज़ार में दख़ल दे (न्यूनतम मज़दूरी क़ानून का संदर्भ यहां उसी हद तक लाग़ू है जहां यह बाज़ार में सभी खिलाड़ियों के लिए एक स्तर तय कर सके)। ऐसा भी हो सकता है कि सिर्फ़ वही किसान जो सामूहिक तौर पर संगठित हो पाएँ और ख़रीदारों से अपना हक़ मांगने की पहल करें वही एमएसपी का फ़ायदा उठा सकें। ऐसे मामलों में जहां किसान इंटरलॉक्ड बाज़ारों से मुक्त होने में अक्षम हों और क़ानून का पालन न करने वाले व्यापारियों से निपटने या सरकार द्वारा दखल दिलवाने में नाक़ाम रहे तो भी यह व्यवस्था चलना मुश्किल होगा। अगर कृषि ऋण क्षेत्र में सुधार किया जाए तो चीज़ें काफ़ी हद तक सुधर सकती हैं।
  • अदृश्य और हाशिए के किसान: यह भी संभव है कि जिन किसानों के पास ज़मीनें नहीं हैं या भूमि के स्वामित्व व खेती के कोई दस्तावेज़ नहीं हैं वे एमएसपी की इस गारंटी से वंचित रह जाएँ। अगर किसी किसान की ‘पहचान’ पर कोई सवाल या विवाद हो तो पंचायत द्वारा जारी प्रमाण पत्र की एक सरल व्यवस्था हम प्रस्तावित कर रहे हैं। साथ ही, ऐसे अदृश्य किसानों को निम्न उपायों से भी लाभ होगा: आयात नीतियों में किसानों के हित को देखते हुए सुधार, कम लागत वाली कृषि-पारिस्थितिकी खेती को बढ़ावा, स्पेशल व्हिकल जैसे NDDB, महिलाओं के सहकार संगठनों को ख़रीद की ज़िम्मेदारी, किसान उत्पादक संगठन, आदि। और वे किसान जो बहुत कम मात्रा में बाज़ार में बेचने लायक़ उत्पाद पैदा कर पाते हैं और इस वजह से उनका शोषण होता है वे इस क़ानून के तहत बनने वाली कुछ सामान्य नीतियों से लाभान्वित हो सकते हैं और कुछ विशेष उपाय जैसे FPO या महिला सरकारों द्वारा ख़रीद या सहकार संगठनों के संघ आदि से उनको भी फ़ायदा होगा। क़ानून में लैंगिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए यह प्रस्ताव है कि शुरुआत में कम-से-कम सरकार का जहां हस्तक्षेप हो वहाँ किसान को भुगतान भूमि के मालिक़ और उसके पति/पत्नी के संयुक्त खातों में हो। यह कहने की ज़रूरत नहीं कि ऐसे किसानों के लिए अन्य निवेशों और उत्पादकता बढ़ाने के लिए संसाधनों तक पहुंच भी ज़रूरी है ताकि उनकी आजीविका को सुरक्षित किया जा सके।
  • मुआवज़े के लिए काग़ज़ी काम (पेपर-वर्क): यहां प्रस्तावित मुआवज़े की व्यवस्था तभी कारगर होगी जब कोई किसान पेपर वर्क से दिखा सके कि उसका हक़ उसे नहीं मिला है (पीडीपीएस के विकल्प में यह प्रस्ताव नहीं है उसे आपदा के मुआवज़े जैसा रखा गया है)। यह समस्या तब सुलझाई जा सकती है जब अधिकतर व्यापार विनियमित बाज़ारों में हो। इसके लिए ज़रूरी है कि देशभर में और ज़्यादा संख्या में विनियमित मंडियां शुरू हों जहां उस क्षेत्र की सभी अहम फ़सलों का व्यापार हो ताकि व्यापार संबंधी सभी रिकॉर्ड बन सकें।
  • व्यापारियों की व्यापार से सम्भावित अनुपस्थिति: हम यह भी मान कर चल रहे हैं कि व्यापारी बाज़ार के लेन-देन में भाग लेने से पीछे नहीं हटेंगे क्यूँकि पूरे देश में एक समान एमएसपी होगी। और व्यापारियों को सिर्फ़ अपने हिस्से के मुनाफ़े को जोड़कर व्यापार करते रहना होगा जैसे कि वे अब तक करते आए हैं। शुरुआती बात-चीत में यह संकेत मिले हैं कि यह व्यापारियों के लिए कोई समस्या नहीं होगी। और साथ ही, पूरी आपूर्ति ऋंखला में जो कड़ियां हैं वे भी व्यापार से पूरी तरह पीछे नहीं हटेंगे। अगर ज़रूरत पड़े तो व्यापारियों के लिए मुआवज़े की व्यवस्था वाली PDPS योजना भी बनाई जा सकती है। इस दस्तावेज़ में दिए गए प्रस्ताव में एक आश्वासन है कि हर किसान को एक ख़रीदार मिलेगा जो एमएसपी पर ख़रीदेगा (और जो सरकारी ख़रीद काउंटर है वह उनके लिए एक फ़ॉल बैक ऑप्शन होगा)।
  • खाद्य मुद्रास्फीति: प्रस्तावित उपायों से उपभोक्ता खाद्य क़ीमतों और अर्थव्यवस्था में सामान्य मुद्रास्फीति में बढ़ोतरी की भी संभावना है। लेकिन ग़रीब उपभोक्ताओं के लिए अगर एक बेहतर और विस्तृत जन वितरण प्रणाली हो तो भूख और कुपोषण को रोका जा सकता है। साथ ही, जैसा कि ऊपर बताया गया है, यह याद रखना चाहिए कि भारत में अधिकतर उपभोक्ता स्वयं किसान भी हैं और कुछ सुझाए गए तरीक़े जैसे PDPS, या जन वितरण प्रणाली, मिड-डे मील, ICDS आदि के लिए ख़रीद का मुद्रास्फीति पर कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं होता। क्रियान्वयन में इन तरीक़ों का जितना अधिक इस्तेमाल किया जाएगा तो एमएसपी की गारंटी का खाद्य मुद्रास्फीति या उपभोक्ताओं पर प्रभाव को उतना ही कम किया जा सकता है। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि कई कल्याणकारी या पर्यावरण सुरक्षा के उपायों से भी ऐसे प्रभाव होंगे और सरकार को किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के हितों की रक्षा करने के लिए जो भी क़ीमत है वह वहन करनी पड़ेगी।
  • निर्यात प्रतिस्पर्धी क्षमता पर प्रभाव: निर्यात प्रतिस्पर्धी क्षमता कुछ हद तक शायद प्रभावित हो लेकिन यह अलग-अलग उत्पादों के लिए अलग-अलग होगा। ऐसे उत्पाद जिनके लिए भारत एकमात्र या प्रमुख उत्पादक है उन पर शायद कोई फ़र्क़ ना पड़े। अगर ज़रूरी हो तो उन उत्पादों पर जो भारत के निर्यात में मात्रा और क़ीमत के आधार पर अहम हैं उन पर कुछ निर्यात में बढ़ावा देने संबंधी इंसेंटिव्स लगाए जा सकते हैं। और हम यह भी मान कर चल रहे हैं कि निर्यात उत्पादों के लिए जो बाज़ार की क़ीमत है वह किसानों को मिलने वाली एमएसपी से ज़्यादा होगी।
  • PDPS में व्यापारियों का गठजोड़: हालांकि पीडीपीएस सिस्टम में सामान्यतः क़ीमतें कम रखने के लिए बड़े स्तर पर व्यापारियों के गठजोड़ का ख़तरा रहता है, यह भी प्रस्ताव है कि अगर एमएसपी की वजह से उन्हें नुक़सान हो तो वह सरकार से मुआवज़ा पाने के लिए दावा कर सकते हैं या पीडीपीएस को एक आपदा मुआवज़ा भुगतान के तौर पर लाग़ू किया जा सकता है। और क्योंकि इस प्रस्तावित व्यवस्था में सरकार भी कई तरीक़ों से बाज़ार में अपना दख़ल देगी तो यह जोखिम काफ़ी हद तक शायद कम हो जाएगा।
  • गुणवत्ता संबंधी पैमाने: गुणवत्ता संबंधी पैमाने किसानों को एमएसपी ना देने के बहाने के तौर पर काम में लिए जा सकते हैं लेकिन अगर ज़्यादा विनियमित बाज़ार हों तो इस पर रोक लगाई जा सकती है।
  • योजना के दिशा-निर्देशों में सुधार: हम यह भी मान कर चल रहे हैं कि इस क़ानून को कार्यान्वित करते समय वर्तमान ख़रीद व्यवस्था में सुधार किए जाएंगे (मसलन, विकेंद्रीकृत और स्थानीय ख़रीद और वितरण पर ज़्यादा जोर होगा, सरकारी ख़रीद और वितरण व्यवस्था का फ़ायदा अधिकाधिक किसानों तक पहुंचाने पर काम होगा, आदि), अन्यथा यह क़ानून सार्वजनिक वित्तीय भार को बढ़ाएगा।
  • अधिक लागत वाली फ़सलों को ग़ैर-इरादतन बढ़ावा: यह सुनिश्चित करने के लिए कि एमएसपी की गारंटी की व्यवस्था से अधिक लागत वाली खेती को बढ़ावा ना मिले और ग़ैर-टिकाऊ इनपुट्स की वजह से कम्पनियाँ आदि फ़ायदा ना उठाएँ, यह ज़रूरी है कि लगातार मॉनिटरिंग हो और कम बाहरी इनपुट वाली खेती को बढ़ावा देने पर ज़ोर हो, और उत्पादन की लागत घटाने पर ज़ोर हो। इसके लिए एक वैकल्पिक निवेश का मॉडल ज़रूरी है क्योंकि इसमें ज्ञान-आधारित और किसान-से-किसान सम्बंधी प्रक्रियाएं जुड़ी हुई हैं। हम यह भी मान कर चल रहे हैं कि किसानों को जब मुनाफ़ा ज़्यादा और एमएसपी की गारंटी मिलेगी तो वे स्वतः ही कम बाहरी इनपुट वाली खेती की तरफ़ जाएँगे।
  • व्यापारिक लेन दन का छिप जाना: यह भी आशंका है कि दंडात्मक प्रावधानों की वजह से कई व्यापारी अपना लेन-देन नियामक संस्थाओं से बचाने के लिए छिपाने का प्रयास करेंगे लेकिन जब किसानों के लिए फॉल-बैक काउंटर और मुआवज़े की व्यवस्था होगी तो उम्मीद है कि अधिकतर किसान ऐसा होने का विरोध करेंगे। लेकिन किसानों के लिए इससे बचने का बेहतर तरीक़ा यही है कि वे स्वयं को इंटरलॉक्ड बाज़ारों से मुक्त कर लें।

 

क़ानूनी तत्वों का प्रोग्रेसिव और इंक्रीमेंटल समावेश

               यह संभव है कि सरकार को एक ऐसा क़ानून बनाने की ज़रूरत ना पड़े जो अपनी संभावनाओं और विस्तार में AIKSCC विधेयक जैसा हो। मसलन, कुछ अध्याय और प्रावधान बाद में किसी तय तारीख़ पर लागू किए जाने के लिए रखे जा सकते हैं।

 

क़ानून का अवयव AIKSCC विधेयक शुरुआत के लिए सम्भावित न्यूनतम संस्करण
अवयव जिन पर काम किया जाना है तीन पहलू:

1)    लागत के अनुमान को बेहतर बनाना और पेरिशबल्ज़ की लागत की गणना के लिए व्यवस्था शुरू करना;

2)    एमएसपी तय करने का एक फ़ॉर्म्युला जो उत्पादन की समग्र लागत पर उचित मुनाफ़ा दे;

3)    ऐसी बेहतर एमएसपी के कार्यान्वयन से जुड़े पहलू।

यह मानकर चलें कि कम-से-कम वर्तमान एमएसपी तो पूरी तरह कार्यान्वित हो, भले ही उसमें सुधार की ज़रूरत हो।
कौन-से कृषि उत्पाद? सभी कृषि उत्पाद जिनमें पेरिशबल्ज़ (दूध, मांस, मछली-उत्पाद, वन-उत्पाद) आदि भी शामिल हैं। सिर्फ़ अनाज के लिए गारंटी जिसमें बाजरा/जुआर, तिलहन, दाल आदि के लिए एमएसपी की घोषणा पहला क़दम
सांस्थानिक ढाँचा इस उद्देश्य के लिए नए केंद्रीय और राज्य आयोग बनाए गए पहले से केंद्र में मौजूद कृषि लागत और मूल्य आयोग और मार्केटिंग विभाग और राज्य स्तर पर कार्यान्वयन की एजेंसियां
कार्यान्वयन के अवयव इस नोट में बताए गए कई तरीक़े इस विधेयक के हिस्से हैं। सरकार एक ऐसे क़ानून से शुरुआत कर सकती है जो 23 फ़सलों के लिए एमएसपी से नीचे ख़रीद पर रोक लगाता हो और साथ ही फ़ॉल-बैक ख़रीद काउंटर और जिन्हें एमएसपी का लाभ नहीं मिलता उनके लिए मुआवज़े की व्यवस्था।

 

 

 

 

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[1] एमएसपी = न्यूनतम समर्थन मूल्य